MP:पैरामेडिकल कॉलेजों की मान्यता पर हाईकोर्ट की बड़ी सख्ती, 150 कॉलेजों की प्रवेश प्रक्रिया पर रोक

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जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पैरामेडिकल कॉलेजों की मान्यता और एडमिशन प्रक्रिया को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने राज्य के 150 से ज्यादा पैरामेडिकल कॉलेजों की मान्यता और प्रवेश प्रक्रिया पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दीपक खोत की विशेष युगलपीठ ने यह अंतरिम आदेश सुनाते हुए मान्यता प्रक्रिया को “हास्यास्पद और बेतुका” बताया।

■ नर्सिंग घोटाले से जुड़ा मामला, कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान

यह मामला पहले से चल रहे नर्सिंग कॉलेज फर्जीवाड़े से जुड़ा है। याचिका लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन द्वारा दायर की गई थी, जिसमें हाईकोर्ट को बताया गया कि नर्सिंग की ही तरह पैरामेडिकल कॉलेजों में भी फर्जी मान्यता और अवैध प्रवेश की प्रक्रिया चल रही है। कोर्ट ने इस पर स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे एक अलग जनहित याचिका के रूप में दर्ज कर लिया था।

■ अदालत की सख्त टिप्पणी: “गुजरे हुए सत्र की मान्यता कैसे?”

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए सवाल उठाया कि जब शैक्षणिक सत्र 2023-24 और 2024-25 पहले ही समाप्त हो चुके हैं, तो उनकी मान्यता वर्ष 2025 में कैसे दी जा सकती है? यह प्रक्रिया सिर्फ बेतुकी ही नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है।

■ 23 जुलाई तक सभी मान्यताओं और प्रवेश प्रक्रिया पर रोक

कोर्ट ने अगली सुनवाई तक सभी मान्यता और प्रवेश संबंधी कार्यवाहियों पर रोक लगा दी है। मामला अब नर्सिंग कॉलेज घोटाले के साथ 24 जुलाई को सुना जाएगा।

■ एमपी पैरामेडिकल काउंसिल की भूमिका पर सवाल

याचिका में यह भी बताया गया कि एमपी पैरामेडिकल काउंसिल बिना मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (MPMSU) की संबद्धता के ही कॉलेजों को मान्यता दे रही है और छात्रों को दाखिले दिए जा रहे हैं। इतना ही नहीं, जिन भवनों को CBI ने नर्सिंग घोटाले में “अनफिट” बताया है, उन्हीं में पैरामेडिकल कोर्स की मंजूरी दी जा रही है।

■ सरकार की नीतियों पर कोर्ट का आश्चर्य

राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में बताया गया कि वर्ष 2021 में भारत सरकार द्वारा नए अधिनियम के तहत पैरामेडिकल काउंसिल गठित की गई थी। लेकिन नवंबर 2024 में राज्य कैबिनेट ने पुरानी एमपी पैरामेडिकल काउंसिल को फिर से जीवित कर दिया। इसके चलते मान्यता में देरी हुई। इस पर कोर्ट ने सवाल किया, “ऐसी नीतियां बनाता कौन है, जिसमें गुजरे सत्रों के लिए भी छात्रों को प्रवेश दिया जा रहा है?”

 

सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी बताया गया कि प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला, पैरामेडिकल काउंसिल के पदेन चेयरमैन हैं। इसके बावजूद इस क्षेत्र में अनियमितताएं और नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।


 

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