June 20, 2026 11:27 pm

बस्तर मॉडल की पूरे देश को सीख: 8241 परिवारों को मिला जमीन पर वैध हक, प्रशासन खुद पहुंचा लोगों तक

रायपुर, 20 जून 2026

 बस्तर मॉडल की पूरे देश को सीख: 8241 परिवारों को मिला जमीन पर वैध हक, प्रशासन खुद पहुंचा लोगों तक

 बस्तर मॉडल की पूरे देश को सीख: 8241 परिवारों को मिला जमीन पर वैध हक, प्रशासन खुद पहुंचा लोगों तक

किसी परिवार के मुखिया की मृत्यु हो जाए और वर्षों बाद भी जमीन के सरकारी कागजों में उनका ही नाम दर्ज रहे। ऐसे में परिवार को हर छोटे-बड़े काम के लिए परेशानी उठानी पड़ती है। बस्तर में हजारों परिवारों की यही समस्या थी। जिला प्रशासन खुद आगे बढ़कर इस परेशानी को दूर करने का काम कर रही है। बस्तर जिले में पिछले चार वर्षों के लंबित फौती नामांतरण मामलों को निपटाने के लिए विशेष अभियान चलाया गया। इस अभियान का उद्देश्य था कि जिन लोगों की मृत्यु हो चुकी है, उनकी जमीन के रिकॉर्ड में उनके परिवार के सही वारिसों का नाम दर्ज किया जाए। इस काम की शुरुआत गांवों से हुई। ग्राम सचिवों ने पिछले चार वर्षों में मृत्यु को प्राप्त लोगों की सूची तैयार की। इसके बाद पटवारियों ने उन लोगों की पहचान की जिनके नाम पर जमीन दर्ज थी और जिनके मामलों में फौती नामांतरण की जरूरत थी। कोटवारों ने गांव स्तर पर जानकारी का सत्यापन किया और तहसीलदारों ने पूरे अभियान की निगरानी की।

 बस्तर मॉडल की पूरे देश को सीख: 8241 परिवारों को मिला जमीन पर वैध हक, प्रशासन खुद पहुंचा लोगों तक

अभियान के दौरान बस्तर जिले के 611 गांवों से जानकारी जुटाई गई। ग्राम सचिवों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले चार वर्षों में 17,405 लोगों की मृत्यु दर्ज हुई थी। इनमें से 8,651 ऐसे मामले मिले जिनमें फौती नामांतरण की आवश्यकता थी। इसके बाद ग्राम सचिव, पटवारी और कोटवार की संयुक्त टीम ने घर-घर जाकर ,जिन परिवारों के पास मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं था, उनके लिए प्रमाण पत्र बनवाए गए। वारिसों की जानकारी और वंशवृक्ष तैयार किए गए। सभी दस्तावेज पूरे होने के बाद नामांतरण की प्रक्रिया शुरू की गई। इस विशेष अभियान के परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे। अब तक 8,241 मामलों में फौती नामांतरण पूरा कर दिया गया है। इसका मतलब है कि हजारों परिवारों की जमीन के सरकारी रिकॉर्ड अब सही हो गए हैं। केवल 410 मामले ही शेष हैं, जिन पर कार्य जारी है।

यह अभियान बस्तर जिले की सभी प्रमुख तहसीलों में चलाया गया। इनमें तोकापाल, करपावंड, बस्तर, बास्तानार, बकावंड, भानपुरी, नानगुर, जगदलपुर, लोहंडीगुड़ा और दरभा जैसे सुदूर आदिवासी अंचल शामिल हैं। सबसे अधिक प्रगति बकावंड, करपावंड, नानगुर और बास्तानार जैसे क्षेत्रों में देखने को मिली, जबकि जगदलपुर और लोहंडीगुड़ा में लगभग सभी पात्र मामलों का निराकरण कर दिया गया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। बस्तर में चलाया गया यह विशेष फौती नामांतरण अभियान इसी सोच का परिणाम है। जिन परिवारों के सदस्य अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनके वारिसों को उनके अधिकार समय पर मिलें, यह हमारी प्राथमिकता है। हजारों परिवारों के जमीन संबंधी रिकॉर्ड अपडेट होने से उन्हें भविष्य में किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह अभियान सुशासन, संवेदनशील प्रशासन और जनसेवा का एक अच्छा उदाहरण है, जिसमें प्रशासन स्वयं लोगों के घर तक पहुंचकर उनकी समस्या का समाधान कर रहा है।

बस्तर जिले की सभी तहसीलों में इस अभियान को अच्छी सफलता मिली। तोकापाल में 1,454, करपावंड में 504, बस्तर में 1,019, बास्तानार में 337 और बकावंड में 1,142 मामलों का निराकरण किया गया। वहीं भानपुरी में 959, नानगुर में 518, जगदलपुर में 1,057, लोहंडीगुड़ा में 799 और दरभा में 452 परिवारों के जमीन संबंधी रिकॉर्ड अपडेट किए गए। सबसे अच्छी प्रगति जगदलपुर, लोहंडीगुड़ा और बकावंड क्षेत्रों में देखने को मिली।

इस अभियान की खास बात यह रही कि लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़े। प्रशासन खुद गांवों तक पहुंचा, रिकॉर्ड खंगाले, दस्तावेज तैयार कराए और पूरी प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा किया। तहसीलदार और नायब तहसीलदार स्तर पर नियमित मॉनिटरिंग की गई, जिससे कार्य में तेजी आई।

बस्तर कलेक्टर ने कहा कि जिले के कई दूरस्थ और पूर्व में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को जमीन संबंधी कार्यों के लिए लंबे समय तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे। कई परिवारों को केवल इसलिए परेशानी होती थी क्योंकि जमीन के रिकॉर्ड में मृत व्यक्ति का नाम दर्ज था। विशेष अभियान चलाकर प्रशासन ने स्वयं गांवों तक पहुंचकर इस समस्या का समाधान किया। अब हजारों परिवारों के जमीन संबंधी रिकॉर्ड सही हो गए हैं, जिससे उन्हें अपने अधिकार प्राप्त करने, बैंकिंग सुविधाओं का लाभ लेने और शासकीय योजनाओं से जुड़ने में आसानी होगी। इससे न केवल लोगों का प्रशासन पर विश्वास मजबूत होगा, बल्कि जमीन संबंधी विवादों में भी कमी आएगी और ग्रामीणों का जीवन अधिक सरल बनेगा।

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