October 3, 2026 9:29 am

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यूरिया की असली कीमत उड़ा देगी होश: ₹300 की बोरी पर सरकार दे रही ₹2,700 की बंपर सब्सिडी, वित्त मंत्री ने बताई बड़ी वजह

देश के करोड़ों अन्नदाताओं के लिए खेती की लागत को नियंत्रण में रखने और फसलों की पैदावार बढ़ाने में यूरिया खाद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अक्सर किसान सहकारी समितियों या खाद की दुकानों से 45 किलो यूरिया की बोरी लगभग ₹266 से ₹300 के आसपास खरीदते हैं और इसे ही इसकी सामान्य कीमत मान बैठते हैं। लेकिन इस खाद की बोरी का जो वास्तविक अंतरराष्ट्रीय और उत्पादन मूल्य है, वह किसी भी आम नागरिक को चौंकाने के लिए काफी है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस भारी अंतर पर से पर्दा उठाते हुए एक बड़ा खुलासा किया है।

वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया है कि वैश्विक बाजार में जिस यूरिया की एक बोरी की असली लागत ₹3,000 तक पहुंच चुकी है, उसे भारत सरकार अपने राजकोष से भारी भरकम सब्सिडी देकर किसानों को मात्र ₹300 के आसपास उपलब्ध करा रही है। यानी हर एक बोरी पर केंद्र सरकार लगभग ₹2,700 का वित्तीय घाटा खुद वहन कर रही है, ताकि देश के किसानों पर महंगाई की जरा भी आंच न आ सके।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल, प्राकृतिक गैस (Natural Gas) और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आए उतार-चढ़ाव के कारण रासायनिक उर्वरकों की उत्पादन लागत में रिकॉर्ड उछाल आया है। यदि सरकार बाजार को खुला छोड़ दे, तो किसानों को एक बोरी के लिए अपनी जेब से ₹3,000 तक ढीले करने पड़ सकते हैं, जिससे खेती की लागत बेकाबू हो जाएगी।

  • यूरिया बोरी की कुल वैश्विक लागत: लगभग ₹3,000 प्रति बैग

  • किसानों द्वारा चुकाई जाने वाली खुदरा कीमत: लगभग ₹266 से ₹300 प्रति बैग

  • सरकार द्वारा वहन की जा रही प्रति बोरी सब्सिडी: लगभग ₹2,700 (लागत का करीब 90%)

  • सालाना फर्टिलाइजर सब्सिडी बजट: 1.7 लाख करोड़ से लेकर 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक

इस गणित से यह साफ हो जाता है कि किसान जो भुगतान करते हैं, वह यूरिया की कुल लागत का मात्र 10 प्रतिशत हिस्सा होता है। बाकी का 90 फीसदी खर्च देश का सरकारी खजाना चुकाता है।

आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले में कृषि और बागवानी से जुड़े एक विशेष कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस भारी सब्सिडी के पीछे की मंशा और सरकार की प्राथमिकताओं को साझा किया। उन्होंने रेखांकित किया कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों, रूस-यूक्रेन संकट और मध्य पूर्व की परिस्थितियों के चलते वैश्विक फर्टिलाइजर सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार का दृढ़ संकल्प रहा है कि अंतरराष्ट्रीय संकट का बोझ भारतीय किसानों के कंधों पर नहीं डाला जाएगा।

वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और किसानों को वैश्विक वैल्यू चेन से जोड़ने के लिए निरंतर निवेश कर रही हैं। अगर रासायनिक उर्वरकों की कीमतें बढ़ाई जातीं, तो इसका सीधा असर खाद्यान्न उत्पादन, महंगाई (Food Inflation) और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता। इसलिए सरकारी खजाने पर दबाव आने के बावजूद किसानों को रियायती दरों पर खाद उपलब्ध कराना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है।

रासायनिक यूरिया पर सरकारी खजाने का इतना बड़ा हिस्सा खर्च होने के कारण अब सरकार देश में यूरिया के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग को कम करने के लिए टिकाऊ विकल्पों को तेजी से बढ़ावा दे रही है। पारंपरिक 45 किलो की दानेदार बोरी के विकल्प के रूप में इफको (IFFCO) द्वारा विकसित तरल ‘नैनो यूरिया’ (Nano Urea) और ‘नैनो डीएपी’ के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

  • परिवहन और भंडारण की बचत: 500 मिलीलीटर की एक नैनो यूरिया बोतल पारंपरिक 45 किलो की बोरी के बराबर काम करती है, जिससे भारी माल ढुलाई और गोदामों के खर्च में भारी कटौती होती है।

  • पोषक तत्व दक्षता में सुधार: दानेदार यूरिया का जहां 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा ही पौधे सोख पाते हैं, वहीं नैनो यूरिया की अवशोषण क्षमता 80 प्रतिशत से अधिक होती है।

  • मिट्टी और भूजल का संरक्षण: अत्यधिक रासायनिक यूरिया के प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता घटने और भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण का खतरा रहता है, जिसे संतुलित खाद और जैविक विकल्पों से रोका जा सकता है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, गोरखपुर, प्रयागराज से लेकर बिहार, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश के किसानों के लिए रबी सीजन (गेहूं, सरसों, आलू की बुवाई) की शुरुआत होने जा रही है। रबी की फसलों के समय यूरिया और डीएपी (DAP) की मांग चरम पर पहुंच जाती है।

प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि आगामी रबी फसलों के लिए देश भर में खाद का पर्याप्त बफर स्टॉक उपलब्ध है और किसी भी जिले में किल्लत नहीं होने दी जाएगी। किसानों को सलाह दी गई है कि वे कालाबाजारी या निर्धारित एमआरपी से अधिक दाम वसूलने वाले खाद विक्रेताओं की शिकायत तुरंत जिला कृषि अधिकारी या टोल-फ्री हेल्पलाइन पर दर्ज कराएं, क्योंकि यूरिया की कीमतें पूरे देश में वैधानिक रूप से नियंत्रित (Statutorily Controlled) हैं।

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