
नई दिल्ली। खेती-किसानी में फसलों की बुवाई से लेकर कटाई तक किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कीटों और रोगों के प्रकोप से फसल को सुरक्षित रखने की होती है। कपास में गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm), धान में तना छेदक (Stem Borer), मक्का में फॉल आर्मीवर्म और दलहन-तिलहन व सब्जियों में रस चूसक कीट हर साल भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं। इनसे निपटने के लिए किसान अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं, जिससे न केवल खेती की लागत बढ़ जाती है बल्कि भूमि की उर्वरा शक्ति और पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है। इसी समस्या का पर्यावरण-अनुकूल और किफायती समाधान निकालने के लिए केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों के कृषि विभाग ने समन्वित कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management – IPM) के तहत फेरोमोन ट्रैप (Pheromone Trap) और यलो/ब्लू स्टिकी ट्रैप (Sticky Trap) के उपयोग को बढ़ावा देना शुरू किया है। सरकार इन ट्रैप्स की खरीद पर किसानों को 50 से 75 प्रतिशत तक की भारी सब्सिडी उपलब्ध करा रही है।
फेरोमोन ट्रैप और स्टिकी ट्रैप जैविक और भौतिक कीट नियंत्रण का ऐसा वैज्ञानिक तरीका है, जिसमें बिना किसी जहरीले रसायन के कीटों को आकर्षित करके नष्ट कर दिया जाता है। फेरोमोन ट्रैप में मादा कीट के गंध वाले कृत्रिम हार्मोन (Lure) का इस्तेमाल किया जाता है। इस गंध से आकर्षित होकर केवल नर कीट ट्रैप की ओर खिंचे चले आते हैं और प्लास्टिक की थैली या फनल में फंस जाते हैं। नर कीटों के नष्ट होने से कीटों का प्रजनन चक्र (Reproduction Cycle) टूट जाता है और अगली पीढ़ी के अंडे या इल्लियां पैदा ही नहीं हो पातीं।
दूसरी ओर, स्टिकी ट्रैप विशेष रूप से पीले और नीले रंग की चिपचिपी प्लास्टिक शीट्स होती हैं। सफेद मक्खी (Whitefly), एफिड्स (माहू), थ्रिप्स और जैसिड्स जैसे छोटे रस चूसक कीट चमकीले रंगों के प्रति स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं। जब ये उड़कर इन शीट्स पर बैठते हैं, तो उस पर लगे खास गोंद के कारण चिपक जाते हैं और वहीं मर जाते हैं। पीला स्टिकी ट्रैप सफेद मक्खी और एफिड्स के लिए और नीला ट्रैप मुख्य रूप से थ्रिप्स के नियंत्रण के लिए बेहद कारगर साबित होता है।
कृषि विभाग की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM), राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) और सब-मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मैकेनाइजेशन जैसी योजनाओं के तहत किसानों को इन उपकरणों पर बड़ा अनुदान दिया जा रहा है:
50% से 75% तक सरकारी अनुदान: सामान्यतः एक एकड़ खेत के लिए 5 से 8 फेरोमोन ट्रैप और 10 से 15 स्टिकी ट्रैप पर्याप्त होते हैं। इन ट्रैप्स और ल्यूर के सेट पर सरकार 50 से 75 प्रतिशत तक की सब्सिडी देती है, जिससे किसान को वास्तविक कीमत का केवल एक-चौथाई हिस्सा ही वहन करना पड़ता है।
दवाओं के खर्च में 40% तक की कटौती: कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि खेत में फसल के शुरुआती चरण में ही ट्रैप्स लगा दिए जाएं, तो महंगे केमिकल स्प्रे पर होने वाले खर्च में 35 से 45 प्रतिशत तक की सीधी बचत होती है।
समय पर निगरानी (Pest Monitoring): ये ट्रैप केवल कीटों को मारते ही नहीं, बल्कि किसान को यह चेतावनी भी दे देते हैं कि खेत में किस कीट की गतिविधि शुरू हो चुकी है, जिससे सही समय पर उचित जैविक उपाय किए जा सकें।
अधिकतम परिणाम प्राप्त करने के लिए विशेषज्ञों ने इन ट्रैप्स को लगाने के वैज्ञानिक दिशानिर्देश जारी किए हैं:
ऊंचाई का ध्यान रखें: फेरोमोन ट्रैप और स्टिकी ट्रैप को हमेशा फसल की ऊंचाई से लगभग 1 से 1.5 फीट ऊपर लकड़ी या बांस के डंडे के सहारे बांधना चाहिए। जैसे-जैसे फसल बढ़ती है, ट्रैप की ऊंचाई भी ऊपर करते रहना चाहिए।
हवा की दिशा: ट्रैप्स को खेत के किनारों और हवा के बहाव के अनुकूल दिशा में लगाना चाहिए ताकि फेरोमोन की गंध पूरे खेत में समान रूप से फैल सके।
ल्यूर बदलना: फेरोमोन कैप्सूल या ल्यूर की प्रभावशीलता आमतौर पर 30 से 45 दिनों की होती है। इसके बाद नई गंध की टिकिया लगाना आवश्यक होता है।
कृषि विभाग द्वारा पारदर्शी व्यवस्था के तहत सब्सिडी सीधे पंजीकृत किसानों को उपलब्ध कराई जाती है:
पोर्टल पर पंजीकरण: इच्छुक किसान अपने राज्य के कृषि विभाग के आधिकारिक डीबीटी पोर्टल (जैसे यूपी कृषि दर्शन, राजकिसान साथी, महाडीबीटी, या एमपी डीबीटी पोर्टल) पर लॉगिन करें।
योजना का चयन: ‘इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट’ या ‘क्रॉप प्रोटेक्शन इक्विपमेंट’ अनुभाग में जाकर फेरोमोन ट्रैप और स्टिकी ट्रैप विकल्प का चुनाव करें।
आवश्यक दस्तावेज: आवेदन के साथ जमीन की खतौनी (जमाबंदी), बैंक पासबुक की प्रति, और किसान का पहचान पत्र संलग्न करें।
सत्यापन और वितरण: संबंधित ब्लॉक या तहसील के कृषि प्रसार अधिकारी (ADO/Kisan Mitra) के सत्यापन के बाद किसान नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), साधन सहकारी समिति या अधिकृत विक्रेताओं से रियायती दर पर इन ट्रैप्स को प्राप्त कर सकते हैं।
रासायनिक कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से न केवल मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है, बल्कि मित्र कीट (जैसे मधुमक्खी और लेडीबर्ड बीटल) भी खत्म हो रहे हैं। सरकार की इस सब्सिडी योजना का लाभ उठाकर किसान कम लागत में अधिक सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल खेती की ओर मजबूत कदम बढ़ा सकते हैं।


















