September 21, 2026 5:27 am

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टाटा संस में फिर छिड़ा घमासान: एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को टाटा ट्रस्ट्स ने बताया ‘अवैध’, नियमों के उल्लंघन का आरोप

देश के सबसे प्रतिष्ठित और 150 साल से अधिक पुराने औद्योगिक घराने टाटा समूह (Tata Group) की मुख्य होल्डिंग कंपनी टाटा संस (Tata Sons) के शीर्ष नेतृत्व को लेकर एक बार फिर बड़ा कानूनी और प्रशासनिक टकराव सामने आ गया है। 17 सितंबर 2026 को हुई बोर्ड बैठक में एन. चंद्रशेखरन को अगले 5 साल के लिए दोबारा चेयरमैन पद पर नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित किया गया था, लेकिन टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत की निर्णायक हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) ने इस फैसले को सिरे से खारिज करते हुए पूरी तरह ‘अवैध’ और ‘कानूनी रूप से शून्य’ (Legal Nullity) करार दिया है।

टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस पुनर्नियुक्ति का कड़ा विरोध करते हुए स्पष्ट किया है कि यह फैसला कंपनी के आंतरिक संविधान यानी आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (AoA) के अनिवार्य प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है। इस घटनाक्रम ने कॉर्पोरेट जगत को वर्ष 2016 के साइरस मिस्त्री विवाद की याद दिला दी है।

टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन. चंद्रशेखरन का मौजूदा दूसरा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होने वाला है। इससे पहले अगस्त महीने में उन्होंने संकेत दिया था कि वे अगला कार्यकाल नहीं लेना चाहते। हालांकि, बाद में नॉमिनेशन एवं रेम्यूनरेशन कमेटी के आग्रह पर वे पद पर बने रहने के लिए सहमत हुए और 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में उनके कार्यकाल को 2032 तक यानी 5 साल बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया।

बोर्ड बैठक में मतदान के दौरान कुल 5 निदेशकों ने हिस्सा लिया। प्रस्ताव के पक्ष में 4 वोट पड़े, जबकि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन और नॉमिनी डायरेक्टर नोएल टाटा ने इसके विरोध में वोट डाला। इसके बाद बोर्ड ने सामान्य बहुमत के आधार पर चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को मंजूरी दे दी, जिसे अब टाटा ट्रस्ट्स ने नियमों के खिलाफ बताकर चुनौती दी है।

टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि टाटा संस कोई सामान्य सूचीबद्ध कंपनी नहीं है, बल्कि इसके गवर्नेंस नियम इसके विशेष ‘आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन’ (AoA) से बंधे हैं।

ट्रस्ट्स की ओर से पेश किए गए कानूनी तर्कों के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • नॉमिनी डायरेक्टर्स का बहुमत अनिवार्य: एओए के नियमों (विशेष रूप से आर्टिकल 104B और 121) के तहत, टाटा संस के चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति जैसे बड़े नीतिगत फैसले के लिए बोर्ड में मौजूद टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों (Nominee Directors) के बहुमत का सकारात्मक समर्थन (Affirmative Vote) होना अनिवार्य है।

  • दो में से बहुमत यानी दोनों के वोट: वर्तमान में टाटा संस के बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स के दो नॉमिनी डायरेक्टर हैं—नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन। ट्रस्ट्स का तर्क है कि जब केवल दो प्रतिनिधि हैं, तो बहुमत का मतलब दोनों का सहमत होना है। चूंकि नोएल टाटा ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया, इसलिए अनिवार्य शर्त पूरी नहीं हुई।

  • कास्टिंग वोट से नियम को बाईपास नहीं किया जा सकता: ट्रस्ट्स ने साफ किया कि चेयरमैन या चेयरिंग डायरेक्टर के स्पेशल/कास्टिंग वोट का इस्तेमाल केवल तब होता है जब सामान्य वोटों में बराबरी (टाई) हो, इसका इस्तेमाल ट्रस्ट के विशेष वीटो या सहमति के नियम को पलटने के लिए नहीं किया जा सकता।

इस मामले में अपने रुख को पुख्ता करने के लिए टाटा ट्रस्ट्स ने देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ से कानूनी सलाह ली है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, प्राप्त कानूनी राय में यह स्पष्ट किया गया है कि टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की सहमति एक स्वतंत्र और पूर्व-शर्त (Independent Condition) है। यदि यह शर्त पूरी नहीं होती है, तो सामान्य बोर्ड का कोई भी बहुमत या कास्टिंग वोट इस प्रस्ताव को वैध नहीं बना सकता। टाटा ट्रस्ट्स ने यह भी याद दिलाया कि साइरस मिस्त्री केस के समय सुप्रीम कोर्ट में खुद टाटा संस ने ट्रस्ट्स के इन विशेष वोटिंग अधिकारों का जोरदार बचाव किया था, ऐसे में कंपनी अब अपने ही पुराने विधिक रुख से पीछे नहीं हट सकती।

सूत्रों और उद्योग जानकारों के मुताबिक, यह टकराव केवल चेयरमैन के पद तक सीमित नहीं है, बल्कि समूह के संचालन को लेकर गहरे नीतिगत मतभेद भी इसकी जड़ में हैं:

  1. टाटा संस की शेयर बाजार लिस्टिंग: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ‘अपर-लेयर NBFC’ नियमों के तहत टाटा संस पर लिस्टिंग का दबाव रहा है। टाटा ट्रस्ट्स का मानना है कि पब्लिक लिस्टिंग से टाटा समूह के धर्मार्थ (Charitable) चरित्र और स्वायत्तता को नुकसान पहुंचेगा।

  2. एयर इंडिया का वित्तीय प्रदर्शन: जनवरी 2022 में सरकार से एयर इंडिया के अधिग्रहण के बाद से एयरलाइन विस्तार में हो रहे भारी खर्च और संचित वित्तीय घाटे को लेकर भी ट्रस्ट्स और बोर्ड के बीच असंतोष की खबरें रही हैं।

  3. सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स में भारी निवेश: समूह के नए पूंजी-गहन प्रोजेक्ट्स और रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट को लेकर शेयरधारकों के स्तर पर अलग-अलग राय सामने आई है।

बोर्ड द्वारा पारित इस प्रस्ताव को अंतिम रूप से प्रभावी होने के लिए आगामी वार्षिक आम बैठक (AGM) में शेयरधारकों की औपचारिक मंजूरी मिलना आवश्यक है।

चूंकि टाटा ट्रस्ट्स के पास कंपनी के 66% शेयर हैं, इसलिए एजीएम के मंच पर यह शक्ति-संतुलन बेहद निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकता है। यदि दोनों पक्षों के बीच बातचीत के जरिए कोई सर्वसम्मत समाधान नहीं निकलता है, तो यह मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) या अदालती चौखट तक भी पहुंच सकता है।

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