प्राकृतिक एवं जैविक खेती कार्यशाला का गरिमामयी आयोजन

बेमेतरा 16 जून 2026

किसानों को प्राकृतिक एवं जैविक खेती के प्रति जागरूक करने तथा टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आज 15 जून 2026 को बेमेतरा जिले के टाउन हॉल में प्राकृतिक एवं जैविक खेती कार्यशाला का गरिमामयी आयोजन किया गया। कार्यक्रम में जिले भर के बड़ी संख्या में कृषकों, कृषि वैज्ञानिकों, कृषि विभाग के अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री संजय श्रीवास्तव, अध्यक्ष नागरिक आपूर्ति निगम, छत्तीसगढ़ शासन रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री दीपेश साहू, विधायक बेमेतरा, श्री प्रहलाद रजक, अध्यक्ष रजककार बोर्ड छत्तीसगढ़ शासन, श्रीमती कल्पना योगेश तिवारी, अध्यक्ष जिला पंचायत बेमेतरा तथा श्री विजय सिन्हा, अध्यक्ष नगर पालिका परिषद बेमेतरा उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री अजय साहू, जिला अध्यक्ष भाजपा ने की, जबकि कार्यक्रम का समन्वयन श्री युवराज ठाकुर, जिला अध्यक्ष भाजपा किसान मोर्चा द्वारा किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. चौलेश्वर चंद्राकर, संभाग प्रभारी भाजपा किसान मोर्चा तथा श्री राकेश तिवारी, महामंत्री भाजपा किसान मोर्चा उपस्थित रहे।

कृषि प्रदर्शनी का अवलोकन एवं भगवान बलराम की पूजा-अर्चना

कार्यक्रम का शुभारंभ सभी अतिथियों द्वारा बेमेतरा जिले के विभिन्न कृषि एवं कृषि संबद्ध विभागों द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी इकाइयों के अवलोकन से हुआ। इसके पश्चात कृषि एवं किसान संस्कृति के प्रतीक दाऊ भगवान बलराम की पूजा-अर्चना कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर उपस्थित अतिथियों ने किसानों से प्राकृतिक एवं जैविक खेती अपनाने का आह्वान किया।

जैविक खाद निर्माण की वैज्ञानिक तकनीकों की दी जानकारी

कृषि विज्ञान केंद्र बेमेतरा के कृषि वैज्ञानिक डॉ. चंद्रशेखर खरे ने जैविक खाद निर्माण एवं उसके वैज्ञानिक प्रबंधन पर विस्तृत जानकारी प्रदान की। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक एवं जैविक खेती अपनाकर मिट्टी को अधिक उर्वर बनाया जा सकता है तथा ह्यूमस बढ़ाकर मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा में वृद्धि की जा सकती है। उन्होंने किसानों को वर्मी कम्पोस्ट, वर्मीवॉश, प्रक्षेत्र गोबर खाद, नाडेप खाद तथा हरी खाद जैसे ढैंचा, सनई एवं मूंग के उपयोग के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि जैविक खाद पौधों एवं पशुओं के प्राकृतिक अवशेषों जैसे गोबर, पत्तियां तथा फसल अवशेषों को सड़ाने-गलाने से तैयार की जाती है, जो मिट्टी की उर्वरता एवं जल धारण क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

जैविक खाद के प्रमुख प्रकार

डॉ. खरे ने बताया कि कम्पोस्ट खाद खेत के कचरे, पत्तियों एवं रसोई के जैविक अवशेषों को गड्ढों में एकत्रित कर नमी की उपस्थिति में सड़ाने से तैयार की जाती है। वर्मीकम्पोस्ट केंचुओं (विशेषकर आइसेनिया फेटिडा) द्वारा जैविक कचरे को विघटित कर बनाई जाने वाली अत्यंत गुणवत्तायुक्त खाद है। हरी खाद के लिए सनई एवं ढैंचा जैसी फसलों को फूल आने की अवस्था में खेत में जोतकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। गोबर खाद पशुओं के गोबर, मूत्र एवं बिछावन सामग्री को गड्ढों में सड़ाकर तैयार की जाने वाली पारंपरिक एवं प्रभावी जैविक खाद है।
उन्होंने बताया कि जैविक खादों के प्रयोग से पौधों को नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश सहित आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व संतुलित मात्रा में धीरे-धीरे प्राप्त होते हैं। इससे मिट्टी की संरचना में सुधार होता है, मिट्टी भुरभुरी बनती है, जड़ों तक वायु संचार बेहतर होता है तथा जल धारण क्षमता बढ़ती है। साथ ही रासायनिक उर्वरकों पर होने वाला खर्च कम होता है और खेती दीर्घकालिक रूप से लाभकारी बनती है।

किसानों को दिलाई जैविक खेती अपनाने की शपथ

कार्यशाला के दौरान डॉ. चंद्रशेखर खरे ने उपस्थित किसानों को जैविक एवं प्राकृतिक खेती अपनाने की शपथ दिलाई तथा पर्यावरण संरक्षण एवं स्वस्थ कृषि व्यवस्था के लिए जैविक खेती को आवश्यक बताया।

प्रगतिशील किसानों ने साझा किए अनुभव

कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के तकनीकी मार्गदर्शन में सफलतापूर्वक प्राकृतिक एवं जैविक खेती कर रहे प्रगतिशील कृषकों श्री रोहित पटेल (ग्राम कंदई) एवं श्री मोहित साहू (ग्राम पड़कीडीह) ने अपने अनुभव एवं सफलता की प्रेरणादायी कहानियां साझा कीं। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक एवं जैविक खेती से उत्पादन लागत में कमी आई है तथा फसलों की गुणवत्ता और बाजार मूल्य में वृद्धि हुई है।

वैज्ञानिकों ने दी आधुनिक एवं प्राकृतिक खेती की जानकारी

कृषि विज्ञान केंद्र की प्रभारी वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. रजनी डी. अगासे ने प्राकृतिक खेती की महत्ता एवं विशेषताओं पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। उन्होंने किसानों को रसायन मुक्त खेती के लाभ बताते हुए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर बल दिया। वहीं कृषि वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र जोशी एवं श्री संजय मानिकपुरी ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए अवशेष प्रबंधन की वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी दी तथा आधुनिक एवं लाभकारी खेती के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। डॉ. डोमन सिंह टेकाम ने जैविक खेती के विभिन्न घटकों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी प्रदान की, जबकि डॉ. लव कुमार ने जैविक कल्चर के प्रयोग एवं उपयोग विधि पर किसानों का मार्गदर्शन किया।

कृषि प्रदर्शनी रही आकर्षण का केंद्र

कृषि विज्ञान केंद्र बेमेतरा की प्रभारी वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. रजनी डी. अगासे के कुशल नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में कृषि प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। प्रदर्शनी में प्राकृतिक एवं जैविक खेती से संबंधित तकनीकों, उत्पादों एवं नवाचारों को प्रदर्शित किया गया, जिसका किसानों ने उत्साहपूर्वक अवलोकन किया।

“प्रकृति के साथ खेती, स्वस्थ किसान-समृद्ध भारत” का दिलाया संकल्प

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि श्री संजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किसानों के हित में अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के नेतृत्व के 12 वर्षों की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बताया कि देशभर में प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न जन-जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित सभी किसानों को “प्रकृति के साथ खेती, स्वस्थ किसान-समृद्ध भारत” का संकल्प दिलाते हुए प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन बनाने का आह्वान किया।

सभी प्रतिभागियों का किया गया आभार व्यक्त

कार्यक्रम के सफल आयोजन के पश्चात उप संचालक कृषि श्री मोरध्वज डड़सेना ने सभी अतिथियों, कृषि वैज्ञानिकों, अधिकारियों एवं किसानों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के सफल संचालन एवं आयोजन में सहायक संचालक कृषि श्री श्यामलाल साहू, कार्यक्रम सहायक श्री शिवकुमार सिन्हा, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी श्री विजय टंडन, कृषि विस्तार अधिकारी श्री मयाराम दिनकर, श्री सतवन नवरंगे सहित कृषि विज्ञान केंद्र के श्री मिलाप, कमलेश, राजेश पाठक, शिवशंकर, गोकुल, कृष्णा साहू एवं धर्मेंद्र यदु का विशेष योगदान रहा। कार्यशाला में जिले के विभिन्न विकासखंडों से आए किसानों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए प्राकृतिक एवं जैविक खेती की नवीन तकनीकों की जानकारी प्राप्त की तथा पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि व्यवस्था के लिए प्राकृतिक खेती को अपनाने का संकल्प लिया।

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