
दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक बार फिर से समीकरणों में भारी उलटफेर देखने को मिल रहा है, जहां एक तरफ भारत और बांग्लादेश के बीच अंतरिम राजनीतिक बदलावों के बाद कूटनीतिक दूरियां बढ़ती नजर आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ ढाका और इस्लामाबाद के बीच नजदीकियां बढ़ाने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के अनुसार, बांग्लादेश की सत्ता में आए नए राजनीतिक बदलावों और संभावित नेतृत्व के बीच पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाने की जोरदार तैयारियां चल रही हैं। इसी सिलसिले में बांग्लादेश के राष्ट्रपति भवन की ओर से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक संदेश भेजा गया है, जिसने कूटनीतिक जानकारों के कान खड़े कर दिए हैं। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे पर्दे के पीछे काम कर रहे तारिक रहमान और नई सरकार के उस सीक्रेट प्लान की चर्चा जोरों पर है, जिसके तहत दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय कूटनीति के पुराने इतिहास को भुलाकर नए मोर्चेबंदी की कोशिश की जा रही है।
बांग्लादेश की राजनीति में हाल के महीनों में हुए ऐतिहासिक और नाटकीय घटनाक्रमों ने देश की विदेश नीति (Foreign Policy) की दिशा ही बदल कर रख दी है। कभी भारत के साथ बेहद करीबी और आत्मीय कूटनीतिक संबंध रखने वाले इस देश में अब सत्ता के समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं, जिसका असर दोनों देशों के आपसी सहयोग पर साफ दिखाई दे रहा है। ऐसे में नई सरकार और वहां के नीति-निर्धारक अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को विविधीकृत (Diversify) करने की कोशिश में जुट गए हैं। इसी नीति के तहत ढाका अब दशकों पुरानी कड़वाहट और साल 1971 के मुक्ति संग्राम के ऐतिहासिक जख्मों को पीछे छोड़कर इस्लामाबाद के साथ आर्थिक, सामरिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। पाकिस्तान भी इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता क्योंकि वह दक्षिण एशिया में कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ने से बचने के लिए बांग्लादेश जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की ताक में हमेशा रहता है।
ढाका के राजनीतिक हलकों में इस बात की चर्चा आम हो चुकी है कि वहां की आगामी या नई सरकार ने पाकिस्तान के साथ मिलकर एक बड़ा और सुनियोजित प्लान तैयार किया है, जिसके केंद्र में व्यापारिक मार्गों को खोलना, रक्षा सहयोग बढ़ाना और दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क (SAARC) के मंच को पुनर्जीवित करने के नाम पर कूटनीतिक पैंतरेबाजी करना शामिल है। तारिक रहमान और उनके करीबी रणनीतिकारों का यह नया प्लान इस बात पर आधारित है कि बांग्लादेश को अपनी स्वतंत्र और मजबूत वैश्विक पहचान बनाने के लिए भारत पर अपनी पारंपरिक कूटनीतिक निर्भरता को कम करना चाहिए और क्षेत्रीय स्तर पर अन्य देशों के साथ संतुलन बनाना चाहिए। इसी रणनीति के तहत पाकिस्तानी उच्चायोग के अधिकारियों और ढाका के नए सत्ता केंद्र के बीच पिछले कुछ हफ्तों में कई दौर की गुप्त और औपचारिक बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें सीधी विमान सेवाओं (Direct Flights) को बहाल करने और व्यापारिक जहाजरानी (Maritime Trade) को फिर से शुरू करने जैसे गंभीर मुद्दों पर सहमति बनती दिख रही है।
बांग्लादेशी राष्ट्रपति की ओर से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को भेजा गया यह ताजा संदेश केवल एक शिष्टाचार पत्र नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच भविष्य के गहरे रणनीतिक गठजोड़ का एक औपचारिक रोडमैप माना जा रहा है। इस संदेश में दोनों मुल्कों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देने, उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडलों के दौरों को तय करने और मुस्लिम जगत के मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन करने की बात कही गई है। पाकिस्तानी हुक्मरानों के लिए यह संदेश किसी बड़ी कूटनीतिक जीत से कम नहीं है क्योंकि पिछले कई दशकों से भारत के प्रभाव वाले इस क्षेत्र में पाकिस्तान की पैठ लगभग नगण्य हो चुकी थी। शहबाज शरीफ सरकार ने भी इस संदेश का गर्मजोशी से स्वागत किया है और पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को निर्देश दिए गए हैं कि वह ढाका के साथ द्विपक्षीय वार्ताओं को तेज करे ताकि आर्थिक बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान को कूटनीतिक मोर्चे पर कुछ राहत मिल सके और वह अपनी खोई हुई साख को थोड़ा बहुत सुधार सके।
बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ती इन नजदीकियों का सबसे सीधा और गंभीर असर भारत की रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ना तय माना जा रहा है। भारत के ठीक पूर्व में स्थित एक पड़ोसी देश का पाकिस्तान के साथ इस तरह कूटनीतिक गलबहियां बढ़ाना नई दिल्ली के सुरक्षा प्रबंधों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है, क्योंकि पूर्वोत्तर राज्यों (North-East States) की सुरक्षा और सीमाई इलाकों की स्थिरता के लिहाज से ढाका का सहयोग भारत के लिए हमेशा से अहम रहा है। इसके अलावा, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) अतीत में बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए करती रही है, इसलिए भारतीय सामरिक विशेषज्ञ इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि कहीं नई सरकार के आने के बाद बांग्लादेश एक बार फिर से भारत विरोधी ताकतों का सेफ सेराफ न बन जाए। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि भारत अपनी कूटनीतिक सूझबूझ से इस बदलते घटनाक्रम को कैसे संभालता है और दक्षिण एशिया के इस नए भू-राजनीतिक समीकरण का क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।









