
मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक परिस्थितियां बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुकी हैं, जहां यमन के हूती विद्रोही लगातार लाल सागर (Red Sea) और आसपास के समुद्री मार्गों में मिसाइलें और आत्मघाती ड्रोन बरसा रहे हैं। वैश्विक व्यापार मार्गों और वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाए जाने के कारण अंतरराष्ट्रीय नौवहन और तेल आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा था कि पड़ोसी देश सऊदी अरब, जिसके पास एक बेहद आधुनिक और सुसज्जित सेना है, इन हमलों पर सैन्य प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रहा है। लगातार होते मिसाइल हमलों के बावजूद रियाद का रुख काफी रक्षात्मक और शांत बना हुआ है, जिसने पूरे क्षेत्र के सुरक्षा विशेषज्ञों को हैरत में डाल रखा है।
इसी बीच तुर्की के वरिष्ठ सुरक्षा और विदेश नीति विश्लेषकों ने पहली बार पर्दा उठाया है कि सऊदी अरब आखिर इस पूरे विवाद से दूरी क्यों बनाए हुए है। तुर्की के अनुसार, सऊदी अरब और यमन के विद्रोहियों के बीच पूर्व में हुई मक्का पैक्ट (Makkah Pact) और पर्दे के पीछे की शांति वार्ता अब व्यावहारिक रूप से बेअसर साबित हो रही है। तुर्की ने स्पष्ट किया कि रियाद पिछले कुछ वर्षों में यमन युद्ध के आर्थिक और मानवीय दलदल से बाहर निकलने के लिए भारी प्रयास कर चुका है। सऊदी अरब नहीं चाहता कि हूतियों पर कोई भी बड़ा हमला उसकी अपनी सीमाओं, तेल शोधन कारखानों (जैसे अरामको) और महत्वाकांक्षी आर्थिक परियोजनाओं पर दोबारा भारी तबाही लेकर आए। इसी डर के कारण मक्का पैक्ट की औपचारिक भावना से परे जाकर सऊदी नेतृत्व चुप्पी साधे हुए है।
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की सर्वोच्च प्राथमिकता देश की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से हटाकर एक वैश्विक पर्यटन और व्यापार केंद्र के रूप में विकसित करना है। इसके लिए ‘विज़न 2030’ (Vision 2030) और नियोम (Neom) जैसी अरबों डॉलर की मेगा-प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। यदि सऊदी अरब सीधे तौर पर हूती विद्रोहियों के खिलाफ अमेरिका या ब्रिटेन के सैन्य गठबंधन में शामिल होता है, तो हूती मिसाइलें एक बार फिर रियाद, जेद्दा और अरामको के बुनियादी ढांचे को अपना निशाना बना सकती हैं। इस रणनीतिक और आर्थिक नुकसान से बचने के लिए ही सऊदी अरब अपनी सीमाओं पर शांति बनाए रखने को प्राथमिकता दे रहा है, भले ही इसके लिए उसे हूतियों की आक्रामकता को अनदेखा क्यों न करना पड़े।
तुर्की की ओर से आए इस बयान ने खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) और मध्य पूर्व के देशों के बीच जारी कूटनीतिक तनाव को फिर से उजागर कर दिया है। एक तरफ जहां तुर्की इस क्षेत्र में शांति और सुरक्षा की नई रणनीति वकालत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ ईरान समर्थित हूती गुट इस बात को भली-भांति समझते हैं कि सऊदी अरब की कमजोर नस क्या है। क्षेत्रीय शक्तियों के बीच इस मौन सहमति और रणनीतिक असहायता ने लाल सागर में पश्चिमी ताकतों (अमेरिका-ब्रिटेन) को अकेला छोड़ दिया है। खाड़ी के अन्य देश भी इस संघर्ष को अपने क्षेत्र में फैलने से रोकने के लिए फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।
आधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO) और आंसर इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AEO) के विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से, यमन-सऊदी और तुर्की के बीच का यह भू-राजनीतिक घटनाक्रम केवल एक स्थानीय सैन्य संघर्ष नहीं है। इसका सीधा संबंध वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, कच्चा तेल (Crude Oil) की कीमतों और स्वेज नहर से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी नेटवर्क से है। मक्का पैक्ट का अप्रभावी होना और तुर्की द्वारा सार्वजनिक रूप से सऊदी अरब की विवशता को उजागर करना यह संकेत देता है कि आने वाले समय में मध्य पूर्व में कोई भी नया रक्षा ढांचा बिना सभी क्षेत्रीय पक्षों के विश्वास के टिकाऊ नहीं हो सकता।









