
दुनिया भर में करीब 3 अरब से ज्यादा लोगों को आपस में जोड़ने का दावा करने वाली दिग्गज टेक कंपनी मेटा (Meta) और उसके संस्थापक मार्क जुकरबर्ग इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर नैतिक और कानूनी संकट में घिर चुके हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम, फेसबुक, मैसेंजर और थ्रेड्स पर बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM / CSAM – Child Sexual Exploitation and Abuse Material) के खुले प्रसार और पीडोफाइल नेटवर्कों की मौजूदगी को लेकर वैश्विक स्तर पर भारी आक्रोश भड़क उठा है। स्टैनफोर्ड इंटरनेट ऑब्जर्वेटरी (SIO), ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ (WSJ) और ‘टेक ट्रांसपेरेंसी प्रोजेक्ट’ (TTP) की संयुक्त खोजी रिपोर्टों ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि मेटा के प्लेटफॉर्म न केवल इस घिनौने कंटेंट को होस्ट कर रहे थे, बल्कि कंपनी का गुप्त एल्गोरिदम सक्रिय रूप से ऐसे अपराधियों को एक-दूसरे से जोड़ रहा था। आम यूजर्स जिस सोशल मीडिया को रील्स देखने और दोस्तों से जुड़ने का जरिया मानते थे, उसके बैकएंड पर बच्चों की सुरक्षा को ताक पर रखकर ऐसा नेटवर्क फल-फूल रहा था जिसकी भनक लाखों अभिभावकों को नहीं थी। अमेरिकी अदालतों, यूरोपीय संघ और भारत सरकार द्वारा इस पर कड़ा संज्ञान लिए जाने के बाद सिलिकॉन वैली से लेकर नई दिल्ली तक हड़कंप मचा हुआ है।
स्टैनफोर्ड इंटरनेट ऑब्जर्वेटरी और वॉल स्ट्रीट जर्नल की जांच में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि यह अवैध कारोबार इंटरनेट के किसी डार्क वेब के गुप्त कोने में नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम के खुले सर्च बार और हैशटैग्स के जरिए चल रहा था। पीडोफाइल नेटवर्क बहुत ही पतले कोडवर्ड्स और सांकेतिक हैशटैग्स—जैसे ‘मैप’ (MAP – Minor Attracted Persons) और आपत्तिजनक कोड्स—का इस्तेमाल करके नाबालिगों की अश्लील तस्वीरों और वीडियो का ‘कंटेंट मेन्यू’ बेच रहे थे।
सबसे वीभत्स पहलू यह था कि इंस्टाग्राम का ऑटोमैटिक रेकमेंडेशन इंजन (Recommendation Algorithm) इस नेटवर्क को तोड़ने के बजाय उसे खाद-पानी दे रहा था। यदि कोई संदिग्ध यूजर किसी एक ऐसे आपत्तिजनक अकाउंट को देखता या फॉलो करता, तो इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम उसे तुरंत वैसे ही दर्जनों अन्य पीडोफाइल अकाउंट्स और कंटेंट सेलर्स को फॉलो करने के सुझाव (Suggestions) देने लगता था। शोधकर्ताओं ने पाया कि मेटा के सर्च सिस्टम ने बाकायदा ऐसी चेतावनी वाली पॉप-अप स्क्रीन दी थी कि “इस सर्च में बाल शोषण की सामग्री हो सकती है”, लेकिन ठीक नीचे “सी रिजल्ट्स एनीवे” (फिर भी परिणाम देखें) का बटन देकर यूजर्स को उस अवैध कंटेंट तक जाने की खुली छूट दे रखी थी। जब व्हिसलब्लोअर्स और कार्यकर्ताओं ने इन प्रोफाइल्स की शिकायत की, तो मेटा की ऑटोमेटेड मॉडरेशन टीम ने यह कहकर शिकायतों को खारिज कर दिया कि “यह हमारी कम्युनिटी गाइडलाइंस का उल्लंघन नहीं करता”।
इस मामले ने तब सबसे विस्फोटक मोड़ ले लिया जब अमेरिकी राज्य न्यू मैक्सिको के अटॉर्नी जनरल राउल टोरेज ने मेटा और मार्क जुकरबर्ग के खिलाफ ऐतिहासिक कानूनी मुकदमा दायर किया। राज्य के न्याय विभाग ने बाकायदा एक गुप्त स्टिंग ऑपरेशन चलाया, जिसका कोडनेम ‘ऑपरेशन मेटाफाइल’ (Operation MetaPhile) रखा गया था। इस ऑपरेशन के तहत पुलिस अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर 13-14 साल के बच्चों की फर्जी प्रोफाइल (डिकॉय अकाउंट्स) बनाईं। जांच में पाया गया कि इंस्टाग्राम के प्लेटफॉर्म फीचर्स ने खुद बाल शिकारियों (Predators) को इन बच्चों के प्रोफाइल तक पहुंचाया और तीन ऐसे संदिग्धों को रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया जो नाबालिग समझकर होटल में मिलने पहुंच गए थे।
अदालत में पेश किए गए मेटा के गोपनीय आंतरिक दस्तावेजों ने दुनिया को सन्न कर दिया। मेटा के खुद के आंतरिक अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया था कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर प्रतिदिन लगभग 1,00,000 (एक लाख) बच्चों को किसी न किसी रूप में ऑनलाइन सेक्शुअल हैरेसमेंट और अनचाहे संदेशों का सामना करना पड़ता है। अदालत ने पाया कि मेटा ने अपने मुनाफे, यूजर एंगेजमेंट और स्क्रीन टाइम को बच्चों की सुरक्षा से ऊपर रखा। जूरी ने मेटा को राज्य के उपभोक्ता संरक्षण कानूनों के उल्लंघन और बच्चों के जीवन को खतरे में डालने का दोषी करार देते हुए 375 मिलियन डॉलर (करीब 3,100 करोड़ रुपये से अधिक) की भारी सिविल पेनल्टी भरने का आदेश सुनाया।
संकट यहीं नहीं थमा। टेक ट्रांसपेरेंसी प्रोजेक्ट (TTP) द्वारा जारी ताजा जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि बच्चों के शोषण का यह खेल अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और पेड विज्ञापनों (Paid Ads) तक पहुंच चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक, मेटा ने अपने ‘ऐड लाइब्रेरी’ के जरिए ऐसे 300 से अधिक विज्ञापनों को अप्रूव करके लाइव चलने दिया, जिनमें नाबालिग बच्चों की अश्लील एआई-जनरेटेड तस्वीरें और न्यूडिफायर ऐप्स (कपड़े हटाने वाले एआई टूल्स) के लिंक शामिल थे।
इन विज्ञापनों को न केवल अमेरिका और यूरोप में लाखों यूजर्स को दिखाया गया, बल्कि इनमें वास्तविक बच्चों की तस्वीरों का भी दुरुपयोग किया गया था। जांच एजेंसियों ने पाया कि मेटा के विज्ञापन समीक्षा तंत्र (Ad Review System) ने मुनाफा कमाने की होड़ में इन स्पष्ट रूप से अवैध विज्ञापनों को हरी झंडी दे दी। इस खुलासे के बाद अमेरिकी सीनेट में हुई तीखी सुनवाई के दौरान सांसदों के भारी दबाव में मार्क जुकरबर्ग को भरी संसद में खड़े होकर उन पीड़ित परिवारों और माता-पिताओं से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी थी, जिनके बच्चे सोशल मीडिया पर ऑनलाइन ग्रूमिंग, ब्लैकमेलिंग (Sextortion) और डिप्रेशन के शिकार हुए थे।
भारत, जो मेटा के लिए दुनिया का सबसे बड़ा यूजर बेस (50 करोड़ से अधिक व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और फेसबुक यूजर्स) है, वहां भी इस मामले को लेकर सरकार बेहद आक्रामक और सख्त हो चुकी है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और गृह मंत्रालय की साइबर अपराध शाखा (I4C) ने स्पष्ट कर दिया है कि बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) के मामले में कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
भारत में लागू कानूनी प्रावधान और सरकारी निर्देश:
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24 घंटे में कंटेंट हटाना अनिवार्य: सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत यदि किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री की पहचान होती है या सरकार/कानून प्रवर्तन एजेंसियां नोटिस भेजती हैं, तो प्लेटफॉर्म को 24 घंटे के भीतर उस सामग्री को वैश्विक रूप से ब्लॉक करना अनिवार्य है।
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सेक्शन 79 का सुरक्षा कवच छिनने की चेतावनी: यदि मेटा या कोई अन्य टेक कंपनी सीएसएएम सामग्री को हटाने या अपराधियों का आईपी डेटा पुलिस से साझा करने में आनाकानी करती है, तो आईटी एक्ट की धारा 79 के तहत मिला ‘सेफ हार्बर’ (Safe Harbour Protection) तुरंत समाप्त कर दिया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह होगा कि कंपनी के भारत स्थित अधिकारियों पर सीधे आपराधिक साजिश का मुकदमा चलेगा।
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पॉक्सो एक्ट और सीबीआई का प्रहार: यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की विशेष ऑनलाइन बाल शोषण रोकथाम इकाई (OCAEU) लगातार अमेरिकी संस्था ‘एनसीएमईसी’ (NCMEC) और इंटरपोल से समन्वय करके ऐसे मामलों में सीधे छापे मार रही है। भारत सरकार ने मेटा को अपने इंस्टाग्राम विज्ञापनों और रील्स एल्गोरिदम की व्यापक ऑडिट रिपोर्ट पेश करने का कड़ा निर्देश दिया है।
इस पूरे अंतरराष्ट्रीय विवाद ने देश के हर उस माता-पिता के लिए खतरे की घंटी बजा दी है, जिनके 13 से 18 साल के किशोर बच्चे स्मार्टफोन पर घंटों इंस्टाग्राम या फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं। तकनीकी कंपनियां जब तक अपने सिस्टम को पूरी तरह सुरक्षित नहीं बनातीं, तब तक अभिभावकों को स्वयं सक्रिय रक्षा तंत्र अपनाना होगा:
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इंस्टाग्राम सुपरविजन (Parental Supervision) ऑन करें: इंस्टाग्राम के सेटिंग्स में जाकर ‘फैमिली सेंटर’ (Family Center) के जरिए अपने बच्चे के अकाउंट को अपने अकाउंट से लिंक करें। इससे आप यह देख सकेंगे कि आपका बच्चा किन अकाउंट्स को फॉलो कर रहा है, उसे कौन फॉलो कर रहा है और वह ऐप पर कितना समय बिता रहा है।
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अकाउंट को हमेशा ‘प्राइवेट’ रखें: यह सुनिश्चित करें कि आपके बच्चे की प्रोफाइल ‘पब्लिक’ न हो। प्राइवेट अकाउंट होने से कोई भी अनजान व्यक्ति बच्चे की तस्वीरें, रील्स या स्टोरीज नहीं देख सकता और न ही सीधे मैसेज (DM) भेज सकता है।
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अज्ञात डायरेक्ट मैसेज (DMs) पर पाबंदी: इंस्टाग्राम की प्राइवेसी सेटिंग्स में जाकर ‘मैसेज कंट्रोल्स’ को कड़ा करें, ताकि कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसे बच्चा फॉलो नहीं करता, वह उसे रिक्वेस्ट या मैसेज न भेज सके।
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लोकेशन टैगिंग और स्कूल यूनिफॉर्म की तस्वीरें न डालें: बच्चों को समझाएं कि वे अपनी पोस्ट्स में अपने स्कूल का नाम, घर का पता, कोचिंग सेंटर या लाइव जीपीएस लोकेशन कभी शेयर न करें। यह जानकारी बाल शिकारियों को बच्चों को ट्रैक करने में मदद करती है।
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संवाद बनाएं और हेल्पलाइन याद रखें: यदि बच्चा सोशल मीडिया पर किसी अनचाहे मैसेज, ब्लैकमेलिंग या आपत्तिजनक तस्वीर से डर रहा है, तो उस पर गुस्सा करने के बजाय उससे खुलकर बात करें। किसी भी ऑनलाइन बाल शोषण या साइबर क्राइम की शिकायत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 या cybercrime.gov.in पोर्टल पर तत्काल बिना किसी झिझक के दर्ज कराएं।
मेटा और मार्क जुकरबर्ग का यह विवाद साबित करता है कि सोशल मीडिया की रंग-बिरंगी दुनिया के पीछे तकनीक का एक ऐसा अंधेरा पक्ष भी है जो मुनाफे के लिए मासूमों की जिंदगी को दांव पर लगा सकता है। कड़े सरकारी नियम, कानूनी जुर्माने और अभिभावकों की सजगता ही वह मजबूत ढाल है जो डिजिटल भारत की नई पीढ़ी को इस गंदे चक्रव्यूह से सुरक्षित रख सकती है।









