
शहर में 9 जून से ब्रिक्स देशों के कृषि अधिकारियों का सम्मेलन होने जा रहा है। खास बात यह है कि करीब 100 साल पहले इंदौर ने ही दुनिया को जैविक खेती की राह दिखाई थी।
ब्रिटिश सरकार ने कैम्ब्रिज से शिक्षा प्राप्त सर अल्बर्ट हॉवर्ड को रासायनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए भारत भेजा था, लेकिन वह यहां के किसानों की मिट्टी और प्राकृतिक तकनीकों की समझ देखकर आश्चर्यचकित रह गये।

होलकर महाराज ने उन्हें 1924 में इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्री (आईपीआई) के निदेशक के रूप में नियुक्त किया और उन्हें 300 एकड़ जमीन दी। यहीं पर हॉवर्ड ने कृषि अपशिष्ट, गाय के गोबर, गोमूत्र और राख का उपयोग करके 'इंदौर कम्पोस्टिंग विधि' विकसित की, जिसने दुनिया में जैविक खेती की नींव रखी। इसके आधार पर उन्होंने 'एन एग्रीकल्चरल टेस्टामेंट' और 'द सॉइल एंड हेल्थ' किताबें लिखीं।

जैविक कृषि विशेषज्ञ अरुण डाइक के मुताबिक, 1935 में महात्मा गांधी भी इस केंद्र में आए थे. आज भी इंदौर के कृषि प्रयोग वैश्विक स्तर पर मिसाल बने हुए हैं.
- 1. ऑर्गेनिक विलेज इंस्टीट्यूट, रंगवासा: 2007 से संचालित यह संस्थान आत्मनिर्भर भारतीय गांवों की थीम पर आधारित है। पिछले 20 वर्षों से यहां पूरी तरह से जैविक खेती की जाती है। अब तक 54 से अधिक देशों के छात्र यहां प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं।
- 2. सनावदिया: यहां जैविक खेती के साथ सोलर कुकिंग का अनोखा प्रयोग किया जा रहा है। आधा एकड़ पथरीली जमीन पर बना यह प्लास्टिक मुक्त केंद्र 50 आदिवासी परिवारों को मुफ्त बिजली प्रदान करता है। यहां का जल स्तर भी स्थिर है.
- 3. केशर पर्वत: सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ. एसएल गर्ग ने महू के पास 22 एकड़ बंजर भूमि पर 50,000 से अधिक पेड़ उगाए हैं। 10 साल की मेहनत से यहां काजू, सेब और जैतून जैसे विदेशी पौधे लहलहा रहे हैं।









