
संसद की जांच समिति ने जस्टिस यशवंत वर्मा के ऊपर लगे तीनों आरोपों को सही पाया है। यह मामला 2025 में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम से नकदी मिलने से जुड़ा है। पैनल की रिपोर्ट बुधवार, 12 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, स्टोररूम में 500 रुपए के नोटों की काफी मात्रा मिली थी। लेकिन जस्टिस वर्मा नकदी के स्रोत, मालिकाना हक या वहां मौजूद होने की संतोषजनक वजह नहीं बता सके। जस्टिस वर्मा इस साल अप्रैल में हाईकोर्ट के जज पद से इस्तीफा दे चुके हैं।
आपको बता दें कि मामला पिछले साल 14 मार्च की रात का है, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंची फायर ब्रिगेड की टीम को वहां रखे सामान के बीच 500-500 रुपये के जले हुए नोट मिले थे। उस समय जस्टिस वर्मा घर पर मौजूद नहीं थे। कैश मिलने की जानकारी सामने आने के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया था। जस्टिस वर्मा ने दावा किया था कि बरामद हुई रकम उनकी नहीं थी। इसके बाद मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया।
कितनी नकदी थी, यह साफ नहीं हो सका
समिति ने कहा कि मौके से नोटों को जब्त नहीं किया गया, न उनकी गिनती हुई और न ही उनकी पूरी सूची बनाई गई। इसी वजह से रिपोर्ट में नकदी की सही रकम बताना संभव नहीं है। लेकिन समिति के मुताबिक, इसका मतलब यह नहीं है कि वहां कम नोट थे। उपलब्ध सबूतों से साफ है कि स्टोर रूम में 500 रुपये के नोट बड़ी संख्या में थे।
पहला आरोप- नकदी का कोई संतोषजनक जवाब नहीं
पहले आरोप में कहा गया था कि न्यायमूर्ति वर्मा के नियंत्रण वाले सरकारी परिसर में बड़ी मात्रा में ऐसी नकदी मिली, जिसका कोई साफ स्रोत या मालिकाना हक सामने नहीं आया। समिति ने इस आरोप को साबित माना। रिपोर्ट में कहा गया कि न्यायमूर्ति वर्मा नोटों के मिलने, उनके स्रोत और उनके मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
दूसरा आरोप- सबूत सुरक्षित नहीं रखे गए
दूसरे आरोप में आग बुझने के बाद घटनास्थल और वहां मौजूद सबूतों को ठीक से सुरक्षित नहीं रखने की बात थी। समिति ने यह आरोप भी साबित माना। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी अधिकारियों की जांच और जगह को सील करने से पहले स्टोर रूम की स्थिति में बदलाव हुआ और बाद में वहां मौजूद नोट भी नहीं मिले। समिति ने कहा कि इस आरोप को साबित करने के लिए यह जरूरी नहीं था कि न्यायमूर्ति वर्मा ने खुद जाकर नोट हटाए हों। उनके नियंत्रण वाले परिसर में सबूत सुरक्षित नहीं रखे गए और इससे महत्वपूर्ण सबूत खत्म हो गए।
तीसरा आरोप- जवाब टालमटोल वाला और अधूरा बताया
तीसरे आरोप में न्यायमूर्ति वर्मा के अलग-अलग स्पष्टीकरण को लेकर सवाल उठाए गए थे। समिति ने कहा कि उनके जवाब में वह साफ-साफ जानकारी नहीं थी जिसकी इस मामले में एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद की जाती है। समिति के मुताबिक, 22 मार्च 2025 के जवाब में न्यायमूर्ति वर्मा ने नकदी के बारे में जानकारी होने से इनकार किया था।
बाद में उनके रुख में बदलाव आया और उन्होंने घटनास्थल की जब्ती, नकदी की गिनती और बाद में हुई सफाई जैसे मुद्दे उठाए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि न्यायमूर्ति वर्मा ने स्टाफ की भूमिका, नकदी को वहां रखे जाने, नकदी हटाए जाने या किसी साजिश जैसी बातों की ओर इशारा किया, लेकिन इन दावों को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत या गवाह पेश नहीं किया गया।
तीन आरोप सिद्ध, फिर भी सबसे बड़ा सवाल बाकी
जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े इस पूरे मामले में संसदीय जांच कमेटी ने तीनों आरोपों को सिद्ध माना है। लेकिन जांच के बावजूद एक अहम सवाल का सटीक जवाब सामने नहीं आ सका है। आखिर उस स्टोररूम में उस समय कुल कितनी नकदी थी? कमेटी अपनी जांच के आधार पर करेंसी नोटों की निश्चित और अंतिम रकम तय नहीं कर सकी। यही वजह है कि मामले में तीन आरोपों पर निष्कर्ष सामने आने के बावजूद नकदी की वास्तविक मात्रा अब भी इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी अनसुलझी कड़ी बनी हुई है।
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