September 19, 2026 11:02 am

घर की चौखट पर खड़े होकर रोना क्यों माना जाता है महाअशुभ? जानिए बुजुर्गों की इस सीख के पीछे छिपे वास्तु, धार्मिक और वैज्ञानिक रहस्य

भारतीय सनातन संस्कृति में घर का मुख्य द्वार और उसकी चौखट (देहरी) केवल ईंट, पत्थर या लकड़ी की चौखट भर नहीं होती, बल्कि यह परिवार की मर्यादा, ऊर्जा संतुलन और सुख-समृद्धि का प्रधान केंद्र मानी जाती है। अक्सर हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग टोकते हैं कि चौखट पर खड़े होकर विलाप नहीं करना चाहिए, रोना नहीं चाहिए या पैर रखकर नहीं खड़ा होना चाहिए। आज की आधुनिक पीढ़ी इसे कई बार केवल अंधविश्वास या पुरानी सोच मानकर नजरअंदाज कर देती है, लेकिन यदि गहराई से पड़ताल की जाए तो इस नियम के पीछे अत्यंत तार्किक वास्तु नियम, पौराणिक मान्यताएं और मनोवैज्ञानिक कारण मौजूद हैं।

धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार घर का मुख्य द्वार वह पहला स्थान है जहां से सकारात्मक दैवीय शक्तियां और धन की देवी मां लक्ष्मी का घर में आगमन होता है। मुख्य द्वार की देहरी को मां लक्ष्मी और कुलदेवी का सम्मान क्षेत्र माना गया है। प्राचीन परंपरा में महिलाएं प्रतिदिन सुबह उठकर सबसे पहले चौखट की सफाई करती हैं, जल छिड़कती हैं और वहां स्वास्तिक अथवा रंगोली बनाती हैं।

जब कोई व्यक्ति चौखट पर खड़ा होकर रोता है, चीखता है या शोक व्यक्त करता है, तो वहां तत्काल नकारात्मक ऊर्जा का घेरा बन जाता है। आंसुओं और विलाप को अमंगल का सूचक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार जिस घर के द्वार पर शोक और रुदन का माहौल रहता है, वहां मां लक्ष्मी प्रवेश करने के बजाय द्वार से ही वापस लौट जाती हैं। परिणामस्वरूप उस परिवार में धीरे-धीरे आर्थिक तंगी, बेवजह के खर्चे और दरिद्रता अपने पैर पसारने लगती है।

वास्तु शास्त्र और ज्योतिष के दृष्टिकोण से घर की देहरी का सीधा संबंध छाया ग्रह राहु से माना गया है। चौखट दो अलग-अलग ऊर्जा क्षेत्रों का मिलन बिंदु होती है—एक बाहर की खुली, चंचल ऊर्जा और दूसरी घर के अंदर की संरक्षित, निजी ऊर्जा। इस संधि स्थल को अत्यधिक संवेदनशील ऊर्जा क्षेत्र माना जाता है।

जब कोई व्यक्ति चौखट पर खड़ा होकर रोता है या क्लेश करता है, तो उस स्थान पर राहु का अशुभ प्रभाव अचानक प्रबल हो जाता है। रोने से उत्पन्न होने वाली भारी और विषादपूर्ण तरंगें घर की सकारात्मक ऊर्जा के सुरक्षा चक्र को तोड़ देती हैं। इससे न केवल घर के अंदर तनाव और अवसाद का माहौल बनने लगता है, बल्कि परिवार के सदस्यों के आपसी तालमेल में दरार पड़ने लगती है और बिना किसी स्पष्ट कारण के आए दिन झगड़े होने लगते हैं।

वास्तु शास्त्र के अनुसार हर निर्मित भवन में ‘वास्तु पुरुष’ का वास होता है। मुख्य द्वार को वास्तु पुरुष के सिर या ऊर्जावान मुख के समान आदरणीय माना गया है। इसके अतिरिक्त, सनातन मान्यता है कि घर की देहरी पर द्वारपाल और कुलदेवता की अदृश्य शक्तियां तैनात रहती हैं, जो बाहर की बुरी नजर, तंत्र-मंत्र और अमंगलकारी तत्वों से घर की रक्षा करती हैं।

जब कोई व्यक्ति देहरी पर खड़े होकर अश्रु बहाता है, तो यह उस रक्षक ऊर्जा और कुलदेवता का तिरस्कार माना जाता है। गरुड़ पुराण और अन्य स्मृति ग्रंथों में भी कहा गया है कि मांगलिक स्थलों और मुख्य द्वारों पर केवल शुभ, शांत और आनंदमय विचार ही व्यक्त किए जाने चाहिए। रोने या विलाप करने से वास्तु दोष उत्पन्न होता है, जो लंबे समय तक घर के मुखिया और संतान के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

पौराणिक इतिहास में चौखट का महत्व भगवान नृसिंह के प्राकट्य से भी जुड़ा हुआ है। दैत्यराज हिरण्यकश्यप को वरदान था कि वह न दिन में मरेगा न रात में, न घर के अंदर मरेगा न बाहर, न अस्त्र से मरेगा न शस्त्र से। भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध करने के लिए संध्याकाल चुना और स्थान के रूप में घर की देहरी यानी चौखट को चुना।

यह पौराणिक घटना इस बात का प्रमाण है कि देहरी संसार और आंतरिक जगत के बीच की सीमा रेखा है। यह स्थान न्याय, संतुलन और दैवीय उपस्थिति का प्रतीक है। ऐसे अति-संवेदनशील और आध्यात्मिक महत्व वाले स्थान पर शोक मनाना या विलाप करना आध्यात्मिक मर्यादा के विरुद्ध आचरण माना गया है। इसलिए भी बुजुर्ग इस स्थान को सदैव शांत और पूज्य बनाए रखने की हिदायत देते हैं।

इस धार्मिक परंपरा के पीछे गहरे व्यावहारिक और सामाजिक नियम भी निहित हैं। प्राचीन समय में घर की बातें घर की चारदीवारी तक ही सीमित रखी जाती थीं। चौखट वह जगह होती है जहां से आने-जाने वाले राहगीर, पड़ोसी और बाहरी लोग आसानी से आपको देख और सुन सकते हैं। यदि कोई चौखट पर रोएगा, तो घर की निजी समस्याएं, दुख और कमजोरी सार्वजनिक हो जाती है।

इसके अतिरिक्त, किसी भी व्यक्ति के घर से निकलते समय या किसी शुभ कार्य के लिए जाते समय उसे रोता हुआ चेहरा दिखना मानसिक रूप से हतोत्साहित करता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह व्यक्ति के आत्मविश्वास को कमजोर करता है और उसे यात्रा या काम में असफलता का भय सताने लगता है। घर में लौटते समय भी यदि द्वार पर कोई रोता मिले, तो दिनभर की मानसिक शांति भंग हो जाती है। बुजुर्गों की यह सलाह दरअसल परिवार के मान-सम्मान, आंतरिक ऊर्जा और सुखद वातावरण को सुरक्षित रखने की एक कालजयी व्यवस्था है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

R . 1

Advertisement Carousel

Your Opinion

Will Donald Trump's re-election as US President be beneficial for India?
error: Content is protected !!