September 19, 2026 8:14 am

मिडिल ईस्ट संकट: होर्मुज और लाल सागर बंद, $100 के पार कच्चा तेल, क्या ठप होगा वैश्विक व्यापार

पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच भड़का सैन्य टकराव अब एक ऐसे विनाशकारी मोड़ पर पहुंच चुका है, जिसने पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार तंत्र को हिलाकर रख दिया है। अभी यह त्रिकोणीय युद्ध शांत भी नहीं हुआ था कि यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच दोबारा शुरू हुए सीधे युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को गंभीर संकट में डाल दिया है। ऊर्जा विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह संघर्ष इसी गति से आगे बढ़ता रहा, तो आधुनिक इतिहास में पहली बार मध्य पूर्व से होने वाला तेल और प्राकृतिक गैस का निर्यात पूरी तरह पंगु हो सकता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा झटका ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Hormuz Strait) का बंद होना साबित हुआ है। सामान्य दिनों में दुनिया भर में उपभोग होने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता था। पिछले छह महीनों से जारी अमेरिका और ईरान के बीच के भीषण युद्ध के चलते दोनों देशों की नौसेनाओं ने इस समुद्री मार्ग की अभूतपूर्व नाकेबंदी कर रखी है। फारस की खाड़ी में मालवाहक जहाजों और तेल टैंकरों का परिचालन पूरी तरह से असुरक्षित हो चुका है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की निर्बाध सप्लाई चैन टूट चुकी है और जहाजों के लिए किसी भी प्रकार की आवाजाही असंभव हो गई है।

होर्मुज जलडमरूमध्य के पूरी तरह जाम होने के बाद वैश्विक ऊर्जा कंपनियों और वाणिज्यिक पोतों के लिए लाल सागर (Red Sea) ही एकमात्र वैकल्पिक मार्ग के रूप में बचा था। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले कुछ सीमित जहाजों ने वैकल्पिक गलियारे के रूप में इस जलमार्ग का उपयोग करना शुरू भी कर दिया था, लेकिन सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच छिड़े नए युद्ध ने इस जीवनरेखा को भी लील लिया है। समुद्री जलमार्गों के एक साथ बंद होने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में हाहाकार मच गया है और कच्चे तेल की कीमतें 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं, जिससे एशियाई और यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति और ईंधन संकट का खतरा गहरा गया है।

हूती लड़ाकों और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच बीते एक दशक से खूनी खींचतान चल रही थी, जिसे 2022 में संयुक्त राष्ट्र (UN) की मध्यस्थता के बाद समझौतों के जरिए काफी हद तक नियंत्रित किया गया था। हालांकि, बीते हफ्ते हूती विद्रोहियों ने सैन्य अभियान चलाते हुए यमन के रणनीतिक लाल सागर तट के एक बहुत बड़े हिस्से पर अपना कब्जा जमा लिया। इसके साथ ही उन्होंने सऊदी जहाजों की पूर्ण नाकेबंदी का ऐलान कर दिया। दूसरी ओर, होर्मुज के बंद होने के बाद सऊदी अरब अपनी ऐतिहासिक ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ को पूरी क्षमता से चला रहा था, जिसके माध्यम से प्रायद्वीप के आर-पार लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक रोजाना लगभग 70 लाख (7 मिलियन) बैरल तेल पहुंचाया जा रहा था। हूती अग्रिम मोर्चे के साथ ही इराक स्थित ईरान-समर्थित शिया मिलिशिया द्वारा इस पाइपलाइन पर किए गए भीषण ड्रोन हमले ने सऊदी अरब के इस सबसे महत्वपूर्ण वैकल्पिक मार्ग को भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया है।

सऊदी अरब और हूतियों के बीच यह ताजा टकराव किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं है, बल्कि इसकी पृष्ठभूमि ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार के समय से ही तैयार हो रही थी। शुरुआती दौर में यमन के हूती गुट ने अमेरिका-ईरान युद्ध से एक रणनीतिक दूरी बनाए रखी थी, लेकिन जुलाई में जब हूतियों का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने तेहरान गया, तो समीकरण तेजी से बदल गए। जब ईरानी विमान हूती प्रतिनिधियों को लेकर यमन की राजधानी सना लौट रहा था, तब सऊदी अरब ने उसे उतरने से रोकने की चेतावनी दी और हूती नियंत्रण वाले सना हवाई अड्डे पर भारी बमबारी कर दी। इस भीषण हमले के बावजूद ईरानी विमान आखिरकार लैंड करने में सफल रहा, लेकिन इसने बदले की आग भड़का दी। नतीजतन, हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर भीषण जवाबी पलटवार किया और खबरों के अनुसार पवित्र शहर मक्का की दिशा में ड्रोन दागे। इस्लामिक इतिहास में पहली बार सऊदी नागरिक सुरक्षा विभाग को मक्का के आवासीय इलाकों में हवाई हमले के सायरन और आपातकालीन रेड अलर्ट जारी करने पड़े, जिसमें नागरिकों को खिड़कियों-दरवाजों से दूर सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने की हिदायत दी गई।

रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, हूतियों के इन आक्रामक कदमों के पीछे फारस की खाड़ी में ईरानी बंदरगाहों पर लगी सख्त अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी भी एक प्रमुख कारण है। अमेरिकी नौसेना द्वारा लागू की गई इस पूर्ण नाकेबंदी ने ईरानी अर्थव्यवस्था को भीतर से झकझोर कर रख दिया है। तेहरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना तेल बेचने में पूरी तरह असमर्थ हो गया है, जिससे ईरानी रियाल का मूल्य ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गया है। मुद्रा के अवमूल्यन और खाद्यान्न संकट का आलम यह है कि आम ईरानी नागरिक नकदी और बचत के बजाय अंडों और बुनियादी खाद्य पदार्थों का भंडारण करने को मजबूर हैं। वाशिंगटन की यह रणनीति ईरान पर अत्यधिक आंतरिक दबाव बना रही है, जिसे लंबे समय तक जारी रखने में अमेरिकी सेना तकनीकी रूप से सक्षम दिखाई दे रही है।

इस बहुआयामी युद्ध में ईरान और हूती विद्रोही पूरी तरह कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखाई दे रहे हैं। हूतियों की आक्रामक सैन्य कार्रवाइयों के जरिए तेहरान यह स्पष्ट संदेश दे रहा है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से ईरानी तेल का व्यापार नहीं हो सकता, तो दुनिया के किसी भी अन्य देश को लाल सागर या खाड़ी के रास्तों से तेल निर्यात करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। मिडिल ईस्ट के व्यापक युद्ध में ईरान के पारंपरिक छद्म गुटों—विशेषकर लेबनान के हिजबुल्लाह और गाजा के हमास—को अत्यधिक सैन्य नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसे में ईरान के ‘प्रतिरोध की धुरी’ (Axis of Resistance) का शक्ति केंद्र अब यमन के हूती विद्रोहियों और इराक के शिया लड़ाकों की तरफ स्थानांतरित हो गया है, जिन्हें तेहरान से उन्नत हथियार, ड्रोन तकनीक, सटीक लॉजिस्टिक्स और उपग्रह खुफिया जानकारी सीधे उपलब्ध कराई जा रही है।

इस अप्रत्याशित संकट के बीच सऊदी अरब के सामने रक्षात्मक चुनौतियां कई गुना बढ़ गई हैं। अमेरिका ने यमन में हूतियों के खिलाफ सीधे जमीनी या सैन्य हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया है और वह केवल सीमित कूटनीतिक सहायता तक सीमित है। ईरान के साथ अपने लंबे युद्ध के कारण वाशिंगटन के पास खुद मिसाइल और ड्रोन इंटरसेप्टर रक्षा प्रणालियों का भंडार सीमित हो चुका है, जिसके चलते वह रियाद को पैट्रियट मिसाइलों की अतिरिक्त खेप तुरंत उपलब्ध कराने में असमर्थ है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने यूनाइटेड किंगडम और मिस्र जैसे पारंपरिक सहयोगियों से भी तत्काल रक्षा मदद की गुहार लगाई है, लेकिन कोई भी विदेशी शक्ति इस दलदल में सीधे उतरने को तैयार नहीं दिख रही है। यहां तक कि सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए बहुचर्चित ‘मक्का समझौते’ के तहत तय रक्षा तंत्र भी अभी तक धरातल पर सक्रिय नहीं हो सका है।

मध्य पूर्व में जारी इस विनाशकारी संघर्ष ने स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल पारंपरिक सेनाएं ही नहीं, बल्कि गैर-सरकारी मिलिशिया समूह भी दुनिया के सबसे संवेदनशील ऊर्जा गलियारों को पंगु बनाने की क्षमता रखते हैं। ऊर्जा बाजारों के लिए चाहे समुद्री चोकपॉइंट हों या फिर भूमिगत तेल पाइपलाइनें, कोई भी मार्ग अब सुरक्षित नहीं रह गया है। इस अभूतपूर्व असुरक्षा ने वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में पश्चिम एशिया के दशकों पुराने प्रभुत्व पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कंपनियों, एशियाई आयातक देशों और वैश्विक शक्तियों को अब मजबूरन पश्चिम एशिया से बाहर अफ्रीका, अमेरिका और वैकल्पिक हरित ऊर्जा स्रोतों की ओर अपने दीर्घकालिक निवेश मोड़ने पर विचार करना पड़ रहा है, क्योंकि जब तक इस भू-राजनीतिक संघर्ष का कोई ठोस कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता, तब तक खाड़ी क्षेत्र का ऊर्जा व्यापार पूरी तरह अनिश्चितता के साए में ही रहेगा।

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