
देश की राजधानी दिल्ली में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूत रीढ़ मानी जाने वाली आशा (Accredited Social Health Activist – ASHA) बहुओं और कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी और बहुप्रतीक्षित खुशखबरी सामने आई है। दिल्ली सचिवालय में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित मंत्रिपरिषद (Cabinet) की अहम बैठक में आशा कार्यकर्ताओं के निश्चित मासिक प्रोत्साहन भत्ते (Fixed Monthly Incentive) को सीधे दोगुना करने के ऐतिहासिक प्रस्ताव को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी गई है। इस फैसले के बाद अब दिल्ली की प्रत्येक पंजीकृत आशा कार्यकर्ता को हर महीने मिलने वाला तय मानदेय 3,000 रुपये से बढ़कर सीधे 6,000 रुपये हो जाएगा। सरकार के इस कदम से लंबे समय से अल्प मानदेय और बढ़ती महंगाई से जूझ रहीं महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई है। यह संशोधित भत्ता दिल्ली के सभी 11 राजस्व जिलों में कार्यरत आशा कर्मियों पर तत्काल प्रभाव से लागू होगा, जिससे उनके बैंक खातों में आने वाली फिक्स्ड मासिक आय में 100% का सीधा इजाफा दर्ज होगा।
दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शहरी गांवों, पुनर्वास कॉलोनियों और जेजे क्लस्टरों में कुल 6,725 आशा कार्यकर्ता पूरी सक्रियता से अपनी सेवाएं दे रही हैं। किसी भी मेट्रो शहर में स्वास्थ्य व्यवस्था केवल बड़े अस्पतालों या डिस्पेंसरियों की चारदीवारी से नहीं चलती, बल्कि उसकी वास्तविक नींव इन महिला कार्यकर्ताओं के दैनिक दौरों पर टिकी होती है। स्वास्थ्य विभाग के तय मानकों के मुताबिक, दिल्ली में औसतन एक आशा कार्यकर्ता लगभग 400 परिवारों या करीब 2,000 नागरिकों की आबादी से सीधे जुड़ी होती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि राजधानी के सवा करोड़ से अधिक आम नागरिकों तक प्राथमिक चिकित्सा परामर्श, नवजात शिशुओं की देखभाल और सरकारी योजनाओं को पहुंचाने का दायित्व इन्हीं 6,725 महिलाओं के कंधों पर है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि मासिक भत्ते में यह बढ़ोतरी केवल एक वित्तीय सहायता नहीं है, बल्कि चौबीसों घंटे धूप, ठंड और बारिश में घर-घर दस्तक देने वाली इन महिला प्रहरियों के अथक परिश्रम और समर्पण को दी गई आधिकारिक मान्यता है।
इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बारीकी यह है कि बढ़ा हुआ ₹6,000 का यह मानदेय केवल ‘फिक्स्ड कंपोनेंट’ (Fixed Monthly Incentive) है। कैबिनेट ने स्पष्ट किया है कि इसके अतिरिक्त आशा कार्यकर्ताओं को मिलने वाले विभिन्न राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों के ‘टास्क-बेस्ड’ (कार्य-आधारित) प्रोत्साहन भत्ते पहले की तरह ही यथावत जारी रहेंगे।
आशा कार्यकर्ताओं को दैनिक आधार पर कई विशिष्ट कार्यों के लिए अलग से इंसेंटिव मिलता है:
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मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य (MCH): गर्भवती महिलाओं का समय पर प्रसवपूर्व पंजीकरण (ANC), नियमित चेकअप और सरकारी अस्पतालों में संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) कराने पर मिलने वाली निर्धारित प्रोत्साहन राशि।
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शिशु टीकाकरण अभियान (Immunization): शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों का संपूर्ण टीकाकरण और नियमित पल्स पोलियो ड्रॉप्स पिलाने पर मिलने वाला भत्ता।
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राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम: टीबी (Tuberculosis) के मरीजों की पहचान, डॉट्स (DOTS) दवाइयों की निगरानी, कुष्ठ रोग सर्वेक्षण और संचारी रोगों के खिलाफ चलाए जाने वाले विशेष अभियानों का पारिश्रमिक।
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विशेष ड्यूटी और यात्रा भत्ता: दिल्ली से बाहर किसी विशेष मिशन या प्रशिक्षण पर भेजे जाने के दौरान मिलने वाले टीए/डीए भत्ते में भी कोई कटौती नहीं की गई है।
इस प्रकार, ₹6,000 का फिक्स्ड मानदेय और ₹3,000 से ₹4,500 के औसत कार्य-आधारित भत्तों को मिलाकर अब दिल्ली की सक्रिय आशा कार्यकर्ताओं की कुल मासिक कमाई ₹9,000 से लेकर ₹10,500 प्रति माह के दायरे में पहुंच जाएगी।
कोरोना महामारी के सबसे भयानक दौर में जब लोग संक्रमण के डर से अपने घरों के दरवाजे बंद किए हुए थे, तब यही आशा कार्यकर्ता बिना अपनी जान की परवाह किए पीपीई किट या साधारण मास्क पहनकर दिल्ली की तंग गलियों में सर्वे कर रही थीं। कंटेनमेंट जोन्स में दवाइयों के पैकेट पहुंचाना, ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन लेवल जांचना, बुजुर्गों की निगरानी और रिकॉर्ड समय में लाखों लोगों को कोविड वैक्सीन लगवाने के लिए प्रेरित करने में इन महिला कर्मियों ने सबसे आगे रहकर लड़ाई लड़ी थी।
सामान्य दिनों में भी एक आशा कार्यकर्ता की दिनचर्या बेहद व्यस्त और चुनौतीपूर्ण होती है:
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डोर-टू-डोर हेल्थ विजिट: अपने आवंटित क्षेत्र के 400 घरों में नियमित रूप से जाकर नवजात शिशुओं, धात्री माताओं और किशोरियों के स्वास्थ्य व पोषण की स्थिति का जायजा लेना।
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स्वास्थ्य एवं पोषण दिवस (VHND): आंगनवाड़ी केंद्रों और स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC/AAMCs) में स्वास्थ्य एवं पोषण दिवसों का सफल आयोजन कराना।
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संस्थागत प्रसव में सहभागिता: किसी भी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा शुरू होते ही रात-बिरात एंबुलेंस बुलाना और अस्पताल ले जाकर डिलीवरी संपन्न होने तक साथ रहना।
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स्वास्थ्य सर्वेक्षण और रिकॉर्ड कीपिंग: स्थानीय आबादी का डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड तैयार करना और आभा (ABHA) आईडी बनवाने में सहयोग करना।
देश के अन्य प्रमुख राज्यों की तुलना में अब तक राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आशा कार्यकर्ताओं को दिया जाने वाला तय मानदेय बेहद निराशाजनक स्थिति में था। जहां दिल्ली देश का सबसे महंगा महानगर है, वहीं यहां का फिक्स्ड इंसेंटिव मात्र ₹3,000 प्रति माह था, जो उत्तराखंड और ओडिशा जैसे छोटे राज्यों के बराबर था।
यदि देश भर के अन्य राज्यों में आशा कर्मियों के फिक्स्ड मानदेय पर नजर डालें:
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महाराष्ट्र एवं सिक्किम: लगभग ₹10,000 प्रति माह का उच्चतम फिक्स्ड मानदेय दे रहे हैं।
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केरल और पुडुचेरी: लगभग ₹7,000 प्रति माह की निश्चित सम्मान राशि देते हैं।
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हरियाणा और पंजाब: विभिन्न भत्तों को मिलाकर ₹6,000 से ₹7,500 तक का पैकेज देते हैं।
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उत्तर प्रदेश और बिहार: केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के मूल ₹2,000 से ₹3,000 के बेस स्लैब पर काम करते हैं।
दिल्ली सरकार द्वारा इसे ₹3,000 से बढ़ाकर ₹6,000 किए जाने के बाद अब राजधानी देश के उन चुनिंदा शीर्ष राज्यों की कतार में शामिल हो गई है जो अपनी सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को अपेक्षाकृत बेहतर और सम्मानजनक बुनियादी मानदेय उपलब्ध करा रहे हैं।
दिल्ली में आशा कार्यकर्ताओं का यह मानदेय विस्तार किसी सहज प्रक्रिया का हिस्सा नहीं रहा है, बल्कि इसके पीछे इन महिला कार्यकर्ताओं का वर्षों लंबा संघर्ष और एकजुटता रही है। दिल्ली आशा कामगार यूनियन के बैनर तले सैकड़ों आशा कर्मियों ने अपनी मांगों को लेकर समय-समय पर जंतर-मंतर, उपराज्यपाल सचिवालय और दिल्ली सचिवालय के बाहर बड़े धरने-प्रदर्शन किए थे।
कार्यकर्ताओं की मुख्य मांगों में केवल मानदेय बढ़ाना ही नहीं, बल्कि कई बुनियादी श्रम अधिकार शामिल रहे हैं:
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उन्हें ‘मानसेवी स्वयंसेवक’ (Honorary Volunteer) के बजाय औपचारिक ‘सरकारी कर्मचारी’ का दर्जा दिया जाए।
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उनके मासिक पारिश्रमिक को दिल्ली के अकुशल या कुशल श्रमिक के न्यूनतम वेतन (जो ₹20,000 से अधिक है) के बराबर लाया जाए।
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6 महीने का सवेतन मातृत्व अवकाश (Maternity Leave), 20 दिनों का आकस्मिक व चिकित्सीय अवकाश और ईएसआई-पीएफ (ESI-PF) जैसी सामाजिक सुरक्षा का कानूनी कवच मिले।
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रिटायरमेंट के बाद जीवन यापन के लिए कम से कम ₹10,000 की मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी की व्यवस्था हो।
हालांकि सरकार ने अभी उन्हें नियमित कर्मचारी घोषित नहीं किया है, लेकिन फिक्स्ड भत्ते को दोगुना करके सरकार ने उनके लंबे संघर्ष को एक बड़ी अंतरिम राहत जरूर प्रदान की है।
सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय में की गई यह वृद्धि महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) का एक प्रत्यक्ष और व्यावहारिक उदाहरण है। आशा के रूप में काम करने वाली अधिकांश महिलाएं निम्न-मध्यमवर्गीय या आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आती हैं, जो अपने परिवार के भरण-पोषण में बराबर का हाथ बंटाती हैं। जब उनके हाथ में एक निश्चित और सम्मानजनक राशि नियमित रूप से पहुंचेगी, तो उनका मनोबल और कार्य के प्रति समर्पण कई गुना बढ़ेगा।
दिल्ली के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, मोहल्ला क्लीनिकों और शहरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और नर्सों की मौजूदगी के बावजूद, यदि मरीज को अस्पताल तक लाने वाली आशा कार्यकर्ता असंतुष्ट रहेगी, तो पूरी स्वास्थ्य प्रणाली चरमरा सकती है। ₹6,000 के इस निश्चित भत्ते से अब आशा कर्मियों को केवल टास्क पूरा करने की भागदौड़ में उलझने के बजाय अपने क्षेत्र के प्रत्येक परिवार के साथ गहरा संवाद स्थापित करने का अवसर मिलेगा। इससे राजधानी में मातृ मृत्यु दर (MMR) और शिशु मृत्यु दर (IMR) को न्यूनतम स्तर पर लाने, शत-प्रतिशत संस्थागत प्रसव सुनिश्चित करने और बच्चों के नियमित टीकाकरण को सफल बनाने के दिल्ली सरकार के मिशन को जबरदस्त ताकत मिलेगी।








